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क्यों युवा कॉर्पोरेट जॉब छोड़कर खेती कर

 ये सिर्फ शौक नहीं, एक तरह का escape और comeback दोनों है।

पहली वजह तो सबसे सीधी है - कॉर्पोरेट थकान। कई युवा इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट करके अच्छी MNC में पहुंचे, पर 9 से 5, टारगेट, स्क्रीन टाइम और शहर के स्ट्रेस ने बर्नआउट दे दिया। खेत में उन्हें जो आजादी, सुकून और अपनी मर्जी से काम करने का एहसास मिल रहा है, वो AC वाले केबिन में नहीं मिला। जैसे मेरठ के अजय त्यागी ने अपनी हाई-पेइंग जॉब छोड़कर यही कहा था कि लग्जरी तो थी, पर शांति नहीं थी।

दूसरी बड़ी वजह है कि खेती अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। ये युवा पुराने हल-कुदाल से नहीं, AI, ड्रोन, सैटेलाइट इमेज, मिट्टी के IoT सेंसर और ब्लॉकचेन ट्रेसेबिलिटी के साथ खेती कर रहे हैं। इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले लड़कों के लिए ये एक नया स्टार्टअप जैसा है, बस ऑफिस की जगह खेत है।

तीसरा है पैसा और बाजार। लोग अब हेल्थ को लेकर बहुत जागरूक हो गए हैं, ऑर्गेनिक खाने की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऑर्गेनिक प्रोडक्ट पर 20-40% ज्यादा दाम मिलता है, D2C ब्रांड, इंस्टाग्राम से सीधे बेचना, एक्सपोर्ट का मौका - तो ये अब घाटे का सौदा नहीं रहा।

और इसमें सरकार भी मदद कर रही है। परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) जैसी योजनाओं में 3 साल तक प्रति हेक्टेयर मदद, क्लस्टर बनाकर ट्रेनिंग, सर्टिफिकेशन में सपोर्ट मिलता है। साथ ही Akshayakalpa जैसी प्राइवेट फेलोशिप भी युवाओं को ट्रेन कर रही हैं।

आखिर में, ये मिट्टी से जुड़ने वाली बात है। अपना उगाया हुआ खाना, साफ हवा, और ये फीलिंग कि मैं कुछ असली बना रहा हूं - ये सुकून कॉर्पोरेट सैलरी स्लिप नहीं दे पाती।

हाँ, ये आसान नहीं है। धूप, बारिश, शुरू में पैदावार कम होना - सब झेलना पड़ता है, पर जो इस रास्ते पर टिक गए, उनके लिए ये सिर्फ करियर बदलना नहीं, जीने का तरीका बदलना है

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